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Educational Psychology | शिक्षा मनोविज्ञान – 2022

दोस्तो आज के आर्टिकल Educational Psychology शिक्षा मनोविज्ञान – 2022 में हम शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ, अलग-अलग विद्वानों द्वारा दी गयी परिभाषा, प्रकृति,शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र,विषय वस्तु और मनोवैज्ञानिको का शिक्षा मनोविज्ञान में योगदान इन सभी टॉपिक पर हम विस्तृत जानकारी देंगे।

शिक्षा मनोविज्ञान दो शब्दों से मिलकर बना है-शिक्षा व मनोविज्ञान । शिक्षा- ‘शिक्षा’ शब्द का अंग्रेजी अनुवाद ‘Education’ है जिसकी ‘उत्पत्ति ‘Educatum’ से मानी जाती है, जिसमें मूल शब्द ‘E’ तथा ‘duco’ है। ‘E’ का अर्थ है अंदर से तथा ‘duco’ का अर्थ है बाहर निकालना।

अर्थात् शिक्षा का अर्थ है बालक की अंतर्निहित क्षमताओं का प्रदर्शन करवाने की प्रक्रिया।

शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषाएँ

विद्वानों द्वारा शिक्षा मनोविज्ञान की निम्नलिखित परिभाषायें दी गयी है

उपाध्याय (Upadhyay) – “शिक्षा मनोविज्ञान विद्यालय वातावरण
में प्राप्त की हुई बालक की क्रियाओं का अध्ययन है।”

क्रो व क्रो (Crow and Crow)– “मनोविज्ञान सीखने से सम्बन्धित
मानव विकास के कैसे की व्याख्या करता है, शिक्षा, सीखने के लिए
क्या को प्रदान करने की चेष्टा करती है। शिक्षा-मनोविज्ञान सीखने के
क्यों और कब से सम्बन्धित है।”

बी.एन. झा (B.N. Jha)– “शिक्षा जो कुछ करती है और जिस
प्रकार वह किया जाता है, उसके लिए उसे मनोवैज्ञानिक खोजों पर
निर्भर होना पड़ता है”

स्किनर (Skinner)– “शिक्षा मनोविज्ञान के अन्तर्गत शिक्षा से
सम्बन्धित सम्पूर्ण व्यवहार और व्यक्तित्व आ जाता है। “

नॉल व अन्य (Noll and Others) “शिक्षा-मनोविज्ञान मुख्य रूप
से शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया से परिवर्तित या निर्देशित होने वाले
मानव-व्यवहार के अध्ययन से सम्बन्धित है।”

एलिस को (Alice Crow)– “शिक्षा मनोविज्ञान, वैज्ञानिक विधि
से प्राप्त किये जाने वाले मानव-प्रतिक्रियाओं के उन सिद्धांतों के प्रयोग
को प्रस्तुत करता है, जो शिक्षण और अधिगम को प्रभावित करते हैं।”

कॉलसनिक (Kolesnik)—”मनोविज्ञान के सिद्धांतों तथा उपलब्धियों का शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग ही शिक्षा मनोविज्ञान है।”

पील (Peel) — “शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा का विज्ञान है।”

भाटिया (Bhatia) – “शैक्षणिक पर्यावरण में किसी विद्यार्थी अथवा
किसी व्यक्ति के व्यवहार के अध्ययन को ही शिक्षा-मनोविज्ञान कहते
हैं।”

शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र

शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत मुख्यतः छः क्षेत्र सम्मिलित है जो कि निम्नलिखित है ।

अधिगमकर्ता (Learner) शिक्षा मनोविज्ञान हमें अधिगमकर्ता को जानने की आवश्यकता से सामना कराता है साथ ही उसे बेहतर रूप से जानने के लिए तकनीकें उपलब्ध कराता है।
इसके अन्तर्गत निम्नलिखित बिंदुओं को सम्मिलित किया जा सकता
है- व्यक्ति की जन्मजात क्षमताएँ, व्यक्तिगत विभिन्नताएँ तथा उनका
मापन, बाहरी, आंतरिक, चेतन व अचेतन व्यवहार (अधिगमकर्ता
का), उसकी वृद्धि एवं विकास की विशेषताएँ- शैशवावस्था से लेकर
वयस्कावस्था तक ।
अधिगम प्रक्रिया (Learning Process) अधिगमकर्ता को जानने के बाद तथा यह निर्णय लेने के बाद कि उसे किस प्रकार के अधिगम अनुभव प्रदान करने हैं।

अधिगमकर्ता द्वारा इन अधिगम अनुभवों को आसानी से तथा आत्मविश्वास से अर्जित कर पाने में सहायता करना एक सामान्य समस्या के रूप में उत्पन्न होती है।
अतः इसके लिए अधिगम की प्रकृति को समझना तथा अधिगम प्रक्रिया किस प्रकार होती है यह जानना आवश्यक है।

इसके अंतर्गत अधिगम के विभिन्न नियमों एवं सिद्धांतों के अलावा स्मृति तथा विस्मृति, प्रत्यक्षण, संप्रत्यय निर्माण, चिंतन, तर्कणा, समस्या समाधान, अधिगम का स्थानांतरण, प्रभावशील अधिगम के तरीके आदि के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है।
अधिगम परिस्थिति (Learning Situation)
शिक्षा मनोविज्ञान उन वातावरणीय कारकों से भी सम्बन्धित होता है जो कि अधिगम परिस्थिति में सम्मिलित किये जाते हैं तथा अधिगमकर्ता एवं अध्यापक की अंतर्क्रिया पर प्रभाव डालते हैं।

कक्षा का वातावरण, समूह-गतिशास्त्र तकनीकें तथा अधिगम को सुचारु बनाने वाले उपकरण, निर्देशन एवं परामर्श आदि बिन्दु जो कि शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया की कार्यप्रणाली को आसान बनाने में सहायता करते हैं, अधिगम परिस्थितियों में शामिल किये जाते हैं।

शिक्षण परिस्थिति (Teaching Situation)
शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा शिक्षण की तकनीकों के भी सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं। इसके द्वारा यह निर्णय लेने में भी सहायता होती है कि अध्यापक द्वारा छात्रों की शारीरिक आयु व मानसिक स्तर के अनुसार किस प्रकार की परिस्थिति प्रस्तुत की जानी चाहिए।

अधिगमकर्ताओं की विशेषताओं के आधार पर किस विषय में किस प्रकार की शिक्षण-अधिगम सहायक सामग्री उपयुक्त रहेगी, आदि।


अधिगम निष्पादन का मूल्यांकन (Evaluation of Learning
Performance)

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक का चहुँमुखी विकास है। इसके अंतर्गत
व्यक्तित्व के संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष आते हैं।
शिक्षा मनोविज्ञान द्वारा आँकलन तथा मूल्यांकन हेतु विभिन्न उपकरणों तथा तकनीकों के सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं।

इसका सम्बन्ध सिर्फ मापन से ही नहीं है, अपितुं परीक्षणों के क्रियान्वयन के बाद परिणामों का विश्लेषण करना, खराब निष्पादन के कारण पता लगाना,कुसमायोजित बालकों को निर्देशन व परामर्श द्वारा सहायता प्रदान करना, परीक्षा तकनीकों, अधिगम शैलियों आदि का विश्लेषण करना तथा अधिगमकर्ता को विभिन्न प्रकार की समस्याओं का समाधान करने में सहायता देना भी इसके अंतर्गत सम्मिलित है।

अध्यापक (Teacher) शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापक के आवश्यक व्यक्तित्व गुणों, रुचियों,अभिवृत्तियों तथा प्रभावशील शिक्षण की विशेषताओं आदि पर भी बल देता है।यह अध्यापक को अपने स्वयं के व्यक्तित्व को समझकर दबाव, द्वंद्व तथा दुश्चिंताओं का सामना करने में भी सहायता करता है।

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति

शिक्षा मनोविज्ञान की प्रकृति की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • यह मनोविज्ञान की एक अनुप्रयुक्त शाखा है।
  • यह दो क्षेत्रों का संयोजन है-शिक्षा व मनोविज्ञान ।
  • यह शैक्षिक परिस्थिति में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह उन कारकों, सिद्धांतों व तकनीकों से सम्बन्धित है जो बालक के वृद्धि एवं विकास के विभिन्न पक्षों को प्रभावित करते हैं।
  • यह अधिगम परिस्थिति तथा प्रक्रिया से सम्बन्धित है जिसके द्वारा अधिगम को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।
  • शिक्षा मनोविज्ञान प्राकृतिक/शुद्ध विज्ञानों की तरह (exact) नहीं है चूँकि मानव व्यवहार की गत्यात्मकता के कारण इसे उतना सटीक रूप से पूर्वकथन नहीं किया जा सकता।
  • यह आदर्शमूलक विज्ञान (Normative Science) नहीं है क्योंकि यह शिक्षा के मूल्यों (Values) से सम्बन्धित नहीं है, साथ ही ” क्या होना चाहिये” से इसका सम्बन्ध नहीं है। यह सिर्फ क्या है की व्याख्या करता है, यह एक अनुप्रयुक्त सकारात्मक विज्ञान (Applied Positive Science) है।
  • जहाँ मनोविज्ञान में जीवन से संबंधित सभी क्षेत्रों में व्यक्तियों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। शिक्षा मनोविज्ञान सिर्फ शैक्षिक वातावरण में छात्रों के व्यवहार के अध्ययन तक ही सीमित है।
  • यह शिक्षा के ‘क्या’ व ‘कैसे’ से सम्बन्धित नहीं है, यह सिर्फ, छात्रों को संतोषजनक रूप से शिक्षा देने के लिए आवश्यक ज्ञान तथा कौशल(तकनीकी निर्देशन) उपलब्ध कराता है।

शिक्षा मनोविज्ञान के विकास में मनोवैज्ञानिको का योगदान

शिक्षा मनोविज्ञान काफी नया व बढ़ता हुआ अध्ययन क्षेत्र है। यद्यपि . यह प्लेटो व अरस्तू के समय से चला आ रहा है परन्तु तब यह एक स्वतंत्र शाखा के रूप में नहीं था।

विभिन्न विद्वानों की शिक्षा मनोविज्ञान को विकसित करने में भूमिका को आगे बताया गया है

प्लेटो (Plato)

शिक्षा मनोविज्ञान की उत्पत्ति प्लेटो (427-347 B.C) के समय से मानी जाती है। उनका विश्वास था कि जन्म के समय बालक में जन्मजात ज्ञान होता है तथा इस ज्ञान में धीरे धीरे बालक की वृद्धि के साथ निपुणता आती जाती है।

अरस्तू (Aristotle)

(384-324 B. C) अरस्तू, प्लेटो के छात्र थे तथा उन्होंने सर्वप्रथम 44 यह निरीक्षण किया कि विचारों के मध्य ‘साहचर्य” (Asociation) होने पर स्मरण / प्रत्याहार (recall) तथा समझ में सुविधा होती है।

उनका विश्वास था कि बोध क्षमता में सामीप्यता, समानता, अनुक्रम तथा तुलना द्वारा सहायता प्राप्त होती है।

जॉन लॉक (John Locke)

जॉन लॉक (1632-1704) ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि सामान्यतः लोग बाहरी बलों के कारण सीखते हैं। उनका मानना था कि मस्तिष्क एक खाली पट्टी (Tabula Rasa) की तरह होता है तथा साधारण अनुभवों का अनुक्रम चिंतन तथा साहचर्य द्वारा जटिल विचारों को उत्पन्न करता है।

जॉन कोमेनियस (John Comenius)

कोमेनियस (1592-1670) बालकों की अधिगम क्षमता में आयु अनुसार पाये जाने वाले परिवर्तनों को बताने वाले प्रथम व्यक्ति थे।

उन्होंने यह भी बताया कि बालक बेहतर रूप से तब अधिगम कर सकते हैं जब उन्हें अनुभवों में सम्मिलित किया जाए ताकि सीखी गई बातों का आत्मसातीकरण हो पाए।

जुआन वाइज (Juan Vives)

वाइव्ज (1493-1540) ने आगमन (Induction) को एक अध्ययन विधि के रूप में प्रस्तुत किया तथा प्रकृति के अध्ययन हेतु प्रत्यक्ष निरीक्षण तथा अनुसंधान को महत्त्वपूर्ण माना।

अधिगम में विद्यालय की स्थिति/जगह, (Location) का महत्त्व बताने वाले वे पहले व्यक्ति थे। उन्होंने सुझाव प्रस्तुत किया कि विद्यालय शोर वाली जगहों से दूर स्थिति होना चाहिए तथा वहाँ अच्छी गुणवत्ता की वायु / हवा उपलब्ध होनी चाहिए।

साथ ही, छात्रों व अध्यापकों के लिए भरपूर मात्रा में भोजन उपलब्ध होना चाहिए। वाइज ने व्यक्तिगत विभिन्नताओं के महत्व को समझने पर बल दिया तथा अभ्यास को अधिगम के लिए एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में प्रस्तावित किया।

रूसो (Rousseau)

रूसो (1712-1778) ने 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में शैक्षिक शास्त्र (Pedagogy) के एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन फ्रांस में किया।उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इमाइल’ (Emile, 1972) में उन्होंने स्वास्थ्य एवं शारीरिक गतिविधियों से होने वाले लाभों के बारे में अपने विचारों की व्याख्या की।

साथ ही यह भी बताया कि ज्ञान अर्जित करने के लिए अनुभव कितना महत्त्वपूर्ण है तथा तर्क तथा अनुसंधान को स्वेच्छापूर्ण प्राधिकार (Arbitary Authority) का स्थान दिया जाना चाहिए।

पेस्टालोजी (Pestalozzi)

कुछ विद्वानों द्वारा पेस्टालोजी को पहले अनुप्रयुक्त शिक्षा मनोवैज्ञानिक (Applied Educational Psychologist) माना गया है।

वे रूसो की शिक्षा को अभ्यास में लाने का प्रयत्न करने वाले प्रथम शिक्षाशास्त्री थे तथा उन्होंने बालकों को उनकी प्राकृतिक रुचियों एवं क्रियाओं की मदद से शिक्षण कार्य करवाया।

हरबर्ट (Herbart)

हरबर्ट (1776-1841 ) को ‘वैज्ञानिक पेडागोजी का जनक’ (Father of Scientific Pedagogy) माना जाता है। वे विषय वस्तु को अनुदेशनात्मक प्रक्रिया से विभेदित करने वाले प्रथम वैज्ञानिक थे। उनका मत था कि विषय में रुचि तथा अध्यापक के कारण अधिगम प्रभावित होता है।

उनका विचार था कि नई सूचना या विषय-सामग्री प्रस्तुत करने के दौरान अध्यापक को बालकों के उपस्थित मानसिक संप्रत्ययों, तथा उनके पूर्व ज्ञान के बारे में ध्यान रखना चाहिए।

विल्हेम वुंट (Wilhelm Wundt)

वुण्ट (1832-1920) ने हरबर्ट के मानसिक बोध (Apperception) सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए चेतना का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जहाँ उन्होंने विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं के मध्य होने वाले साहचर्य की व्याख्या करने का प्रत्यन किया।

विलियम जेम्स (William James)

प्रसिद्ध अमेरिकन मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स (1842-1910) ने टिप्पणी की- “मनोविज्ञान एक विज्ञान है तथा शिक्षण एक कला है, तथा विज्ञान से प्रत्यक्ष रूप में किसी कला का उद्भव नहीं होता है। एक मध्यस्थ अनुसंधानी मस्तिष्क को यह अनुप्रयोग करना होता है। “

जेम्स को अमेरिकन मनोविज्ञान का जनक माना जाता है परन्तु उन्होंने शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था।

उनके प्रसिद्ध व्याख्यानों की शृंखला ‘टॉक टू टीचर्स ऑन ‘साइकोलॉजी’ (Talk to Teachers on Psychology) का प्रकाशन 1899 में हुआ तथा इसे शिक्षा मनोविज्ञान की प्रथम पाठ्यपुस्तक (First Educational Psychology Textbook) माना जाता है।

अल्फ्रेड बिने (Alfred Binet )

बिने (1857-1911) ने ‘मानसिक थकान’ (Mental Fatigue) का प्रकाशन 1898 में किया जिसमें उन्होंने शिक्षा मनोविज्ञान में प्रयोग विधि के अनुप्रयोग का प्रयत्न किया।

बिने ने माना कि विभिन्न आयु समूहों तथा समान आयु समूहों के बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का अध्ययन करना आवश्यक है।

एडवर्ड थॉर्नडाइक (Edward Thorndike)

थॉर्नडाइक (1874-1949) ने शिक्षा में वैज्ञानिक क्रांति का समर्थन किया। उन्होंने ‘प्रभाव के नियम’ (Law of Effect) का विकास किया।

प्रभाव का नियम बताता है कि यदि साहचर्यों के पश्चात् कुछ सुखद प्राप्त होता है तो ये मजबूत हो जाते हैं जबकि यदि उद्दीपक अनुक्रिया के साहचर्य के बाद कुछ असंतोषजनक या दुखद प्राप्त होता है तो ऐसे साहचर्य कमजोर पड़ जाते है।

जॉन डीवी (John Dewey)

संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रगतिशील शिक्षा के विकास में डीवी (1859 1952) का काफी महत्त्वपूर्ण प्रभाव था। उनका मत था कि कक्षा कक्षों में बालकों को अच्छे नागरिक के रूप में तैयार करना चाहिए तथा सृजनात्मक बुद्धि को बढ़ावा देना चाहिए।

जेरोम ब्रुनर (Jerome Bruner)

बुनर (1915) संज्ञानात्मक. विचारधारा को शिक्षा के क्षेत्र में अनुप्रयुक्त करने वाले प्रथम विद्वान थे।

उन्होंने ‘खोज ‘अधिगम’ (Discovery Learning) पर बल दिया जिसमें अध्यापक एक समस्या समाधान वातावरण का निर्माण करता है तथा छात्रों को प्रश्न पूछने, अन्वेषण तथा प्रयोग करने की स्वतंत्रता देता है।

बेंजामिन ब्लूम (Benjamin Bloom)

ब्लूम (1913-1999) ने अपने जीवन के 50 से अधिक वर्ष शिकागो विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में व्यतीत किये। उनका मत था कि सभी छात्र सीख सकते हैं।

उन्होंने ‘शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण’ (Taxonomy of Educational Objective) प्रस्तुत किया। इन उद्देश्यों को उन्होंने तीन भागों में विभाजित किया— संज्ञानात्मक, भावात्मक तथा मनोगतिक ।

नेथेनियल गेज (Nathaniel Gage)

गेज (1917-2008), शिक्षा मनोविज्ञान में महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने शिक्षण में सम्मिलित प्रक्रियाओं को समझने तथा शिक्षण प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए शोध किया।

1963 में वे Handbook of Research on Teaching के संपादक थे जो कि शिक्षा मनोविज्ञान की काफी महत्त्वपूर्ण पुस्तक बन गई।

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